मंगलवार 5 मई 2026 - 20:52
इल्म व अमल;कामयाबी का असल रास्ता हैं

इल्म व अमल;कामयाबी का असल रास्ता हैं

लेखक ; मौलाना सैयद अली हाशिम आब्दी

हौज़ा / शहीद रहबर आयतुल्लाह सैयद अली हुसैनी ख़ामेनेई रहमतुल्लाह अलैह के इरशादात नौजवान नस्ल के लिए एक कामिल रहनुमाई फराहम करते हैं। आपकी नसीहतों का मरकज़ी नुकता यह है कि नौजवान अपनी ज़िंदगी के इस क़ीमती दौर को संजीदगी के साथ इल्म हासिल करने, किरदार साज़ी और अपनी ज़िम्मेदारियों को समझने में खर्च करें।

हौज़ा न्यूज़ एजेंसी के अनुसार ,शहीद रहबर आयतुल्लाह सैयद अली हुसैनी ख़ामेनेई रहमतुल्लाह अलैह के इरशादात नौजवान नस्ल के लिए एक कामिल रहनुमाई फराहम करते हैं। आपकी नसीहतों का मरकज़ी नुकता यह है कि नौजवान अपनी ज़िंदगी के इस क़ीमती दौर को संजीदगी के साथ इल्म हासिल करने, किरदार साज़ी और अपनी ज़िम्मेदारियों को समझने में खर्च करें।

सबसे अहम बात यह है कि तालीम को कभी मामूली न समझा जाए। जैसा कि आयतुल्लाह ख़ामेनेई र०अ० ने फरमाया,सिर्फ़ ख़ूबसूरत गुफ़्तगू या अच्छे ख़यालात इस बात की दलील नहीं कि इंसान ने सही माअनों में इल्म हासिल कर लिया है। असल मेयार मुसलसल मेहनत, बाक़ायदा मुतालेआ और गहरी इल्मी बुनियाद है। बिना इल्म के इंसान समाज में मोअस्सिर किरदार अदा नहीं कर सकता।

आप इस बात पर भी ज़ोर देते थे कि इल्म इंसान को मज़बूत बनाता है। लिहाज़ा नौजवानों को चाहिए कि वो इल्म के ज़रिये अपनी शख्सियत को इस्तेवार करें और दिल लगाकर तालीम हासिल करें। अगर इंसान अपने अफ़कार और सलाहियतों को समाज में प्रभावशाली (मोअस्सिर) बनाना चाहता है तो उसके लिए इल्मी पुख़्तगी निहायत ज़रूरी है।

इसी तरह आपकी तालीमात में अख़लाक़ी पहलू भी बहुत वाज़ेह है। आयतुल्लाह ख़ामेनेई र०अ० के मुताबिक तालीम के साथ पाकदामनी और फ़ुज़ूल मशाग़िल (बेकार कार्यों) से बचना भी नौजवानों की बुनियादी ज़िम्मेदारी है। एक तालिब-ए-इल्म का वक़्त क़ीमती सरमाया है, जिसे बेकार कामों में बर्बाद नहीं करना चाहिए।

इसी तरह आप ख़ास तौर पर दीनी तलबा को मुतनब्बेह करते थे कि अगर कोई शख्स रूहानियत का लिबास पहन ले मगर इल्म हासिल न करे तो यह एक बे-मानी अमल (निरर्थक कार्य) है, बल्कि ऐसा है जैसे कोई किसी चीज़ पर नाजायज़ क़ब्ज़ा कर ले। इसका मतलब यह है कि दीनी मंसब एक बड़ी अमानत है, जिसे वही शख्स संभाल सकता है जो इल्मी तौर पर अहल हो।

इसी रौशनी में आपने इबतिदाई उलूम जैसे नह्व, सर्फ़ और मन्तिक़ की अहमियत को भी उजागर किया और फरमाया: “ये सब इल्मी इमारत की बुनियाद हैं। इनके बिना आला इल्मी मक़ाम तक पहुँचना मुमकिन नहीं। इसी तरह फ़िक़्ह और उसूल की गहरी समझ इंसान को एक प्रभावशाली (मोअस्सिर) आलिम-ए-दीन बनाती है।”

आयतुल्लाह ख़ामेनेई र०अ० की इन नसीहतों का खुलासा यही है कि नौजवान इल्म को संजीदगी से लें, अपने अख़लाक़ को संवारें और अपनी ज़िम्मेदारियों को पहचानें। जो नौजवान इल्म और अमल दोनों में मज़बूत होगा, वही समाज में हक़ीक़ी तब्दीली ला सकता है और एक बामक़सद ज़िंदगी गुज़ार सकता है।

रहबर शहीद आयतुल्लाह ख़ामेनेई र०अ० और दूसरे बुज़ुर्गान-ए-दीन के इरशादात से वाज़ेह होता है कि हर वो अमल जो तालीमी निज़ाम को प्रभावित (मुतास्सिर) करे और नौजवानों, ख़ास तौर से तलबा की तालीम-ओ-तरबियत में रुकावट बने, वो किसी भी सूरत मुनासिब नहीं है।

जैसा कि शेख सदूक़ रहमतुल्लाह अलैह ने शबे क़द्र के सिलसिले में फरमाया: “जो शख्स इन दोनों रातों को इल्मी गुफ़्तगू और सीखने-सिखाने में गुज़ारे, वो ज़्यादा अफ़ज़ल है।”

इसी तरह आयतुल्लाह जवादी आमोली द०ज़ि० ने फरमाया कि शबे क़द्र में इलाही उलूम और दीनी मआरिफ़ को सीखना, बयान करना और सुनना सबसे बेहतर काम है। अगर ऐसी कोई महफ़िल मयस्सर न हो तो इंसान को अम्र बिल मारूफ़ और नही अनिल मुनकर करना चाहिए (अच्छे कामों का हुक्म देना चाहिए और बुरे कामों से रोकना चाहिए) और अगर यह भी मुमकिन न हो तो कम से कम ज़िक्र-ए-इलाही में मशगूल रहे।

आपने ही फरमाया कि तेईसवीं शब, जो माह-ए-मुबारक रमज़ान की तमाम रातों बल्कि उन्नीसवीं और इक्कीसवीं शब से भी अफ़ज़ल है, उसमें सबसे बेहतर काम इल्म हासिल करना और आगाही पैदा करना है। यही इल्म इंसान को अक़्ल तक पहुँचने का ज़रिया बनता है, और जो इंसान आक़िल हो जाए वो सुकून में रहता है और कभी अज़ाब में मुबतला नहीं होता।

इन बातों से नतीजा निकलता है कि जब शबे क़द्र का सबसे बेहतरीन अमल तालीम-ओ-तअल्लुम है, तो आम हालात में इस सिलसिले में ग़फ़लत या कोताही किसी भी सूरत क़ाबिल-ए-क़बूल नहीं है।

सूचना के अनुसार 28 फरवरी से जंग जारी है लेकिन इसके बावजूद हौज़ा ए इल्मिया क़ुम में तालीम का सिलसिला जारी है, जहां ऑफलाइन तालीम नहीं हो पा रही है वहां ऑनलाइन हो रही है!

अल्लाह तआला के वली और रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि व आलेहि व सल्लम के वसी, अमीरुल मोमिनीन इमाम अली अलैहिस्सलाम ने फरमाया: “मौक़े बादलों की तरह तेज़ी से गुज़र जाते हैं, पस नेकी के मौक़ों को ग़नीमत जानो और उन्हें हाथ से जाने न दो।

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